​रूप तेरा देखकर नयनों में कुछ ऐसी मस्ती समा गई,
देखते ही तुझको ये जां दिल की बस्ती में समा गई।

​प्यार के उस मोड़ पर जब तू मिली थी राह में,
तेरी वो मीठी मुस्कान रूह की हस्ती में समा गई।

​दूरियों के दर्द में जब आसमां भी रो पड़ा,
पार करने को जिसे, वो प्यार की कश्ती में समा गई।

​साज़-ए-दिल पर बज रहा है गीत कोई प्यार का,
ज़िंदगी की राह में वो शाम भी इस बस्ती में समा गई।

​राम की इस शायरी में रंग है श्रृंगार का,
इश्क़ की ये दास्तान अब इस हस्ती में समा गई।

राम पटेल सोनभद्र