वो खफा क्या हुए हर सहारा गया…
वो खफा क्या हुए हर सहारा गया।
पहले कश्ती है फिर किनारा गया…
रौशनी की तलब में जो निकले थे हम,
हाथ से इस तरह इक सितारा गया।
ज़िंदगी के सफर में उदासी रही,
मुस्कुराहट का हर इक नज़ारा गया।
दर्द की आंधियों में बुझे सब दिए,
और धड़कन का जैसे किनारा गया।
अब तलक आस की कोई किरण भी नहीं,
दौर ऐसा चला जो गवारा गया।
रचना: राम पटेल सोनभद्र