सच की बात करे तो गुनहगार ठहरता है,
झूठ यहाँ हर चेहरे का गहना-सा लगता है।
कुर्सी के लिए झुकते हैं कितने ही किरदार,
जीत के बाद वही चेहरा बदला-सा लगता है।
वादों की पोटली लेकर आए थे जो घर-घर,
अब हर इक वादा काग़ज़ का टुकड़ा-सा लगता है।
रोटी की बात करे कौन यहाँ इस महफ़िल में,
हर मुद्दा बस भाषण का हिस्सा-सा लगता है।
जनता की आहों से भी गूँजता है ये मौसम,
फिर भी ये शहर अजीब सा चुप-चुप सा लगता है।
अबकी बार उठेगी आवाज़ कुछ ऐसे,
हर झूठ का किला रेत का ढहता-सा लगता है।
- राम पटेल सोनभद्र