देश के दुर्दशा का हिसाब
सपनों की नगरी अब श्मशान हो गई इंसानियत की पहचान भी अनजान हो गयी महँगाई…
सपनों की नगरी अब श्मशान हो गई इंसानियत की पहचान भी अनजान हो गयी महँगाई…
केवल दो गीत लिखे मैंने इक गीत तुम्हारे मिलने का इक गीत तुम्हारे खोने का।…
सच की बात करे तो गुनहगार ठहरता है, झूठ यहाँ हर चेहरे का गहना-सा लगता…
किसी के वादों पे हो निसार, किसी का सच दबा दे बार-बार, किसी के हिस्से…
भूख से तड़पते बचपन पर, कैसा यह उपकार है? पत्थर की उन मूर्तों पर, क्यूँ…
बाबा रस्ता देख रहे हैं कब आयेंगे लाल हमारे, बिन फागुन के बीत गए हैं…
नवरंग में दुनिया सजी, नव रूप में हर शख्स है। मसानो में होली खेलता, बाबा…
चलो रंगों से करके बात, रंगों को बुलाते हैं। खुशियों के हसीं रंगों में, मिलकर…
ये शब्दों की व्यथा देखो, जो न कह पाए तो क्या देखो। शब्दों की सी…