अजीब दास्तान…

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हाँ, पुरुषों का मन भी बड़ा अजीब होता है,
उनके मन का भी अपना एक मौसम होता है।

कभी फौलाद बन दुनिया जीत लेने का मन,
तो कभी थककर किसी कंधे पर सर रखने का मन।

कभी एक छोटी सी हार भीतर तक तोड़ देती है,
तो कभी बड़ी से बड़ी मुसीबत भी उन्हें मौन कर देती है।

कभी जिम्मेदारियों की झुलसाती हुई धूप,
तो कभी भीतर ही भीतर सुलगता हुआ पतझड़।

कभी आँखों में ना आने वाली आंसुओं की बरसात,
जो बाहर नहीं, बस अंदर ही अंदर भिगोती है रात।

कभी खुशियों की बसंत सा चहकता हुआ बचपन,
तो कभी दुनिया की भीड़ में एक खाली, वीरान सा मन।

हाँ, उनके मन का भी तो एक मौसम होता है,
जो कभी पत्थर सा सख्त, तो कभी मोम सा नरम होता है।

-राम पटेल सोनभद्र

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