बेटे (Bete)

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कहाँ कह पाते हैं वो अपनी तकलीफ़ें,
हँसकर घर का हर बोझ उठा लेते हैं बेटे (Bete)।

खिलौनों की उम्र में ही जो ज़िम्मेदारी समझ ले,
वही तो घर का मान बढ़ा देते हैं बेटे।

तपती धूप में जलते हैं ताकि घर में ठंडक रहे,
अपनों के सपनों के लिए अपनी नींदें लुटा देते हैं बेटे।

कोई पूछता नहीं उन रातों का हाल उनका,
जो चुपचाप अंधेरों में भी आँसू छुपा लेते हैं बेटे।

माँ की दवा और बहन की शादी की फ़िक्र में,
शहरों की भीड़ में खुद को भुला देते हैं बेटे।

पिता के झुके कंधों को जब सहारा मिलता है,
तब असली कुल-दीपक कहलाते हैं बेटे।

लोहा तपे तो औज़ार बनता है, और बेटा तपे तो परिवार,
हर मुश्किल में ढाल बनकर साथ निभाते हैं बेटे।

भले ही लोग कहें कि कठोर होते हैं ये पत्थर की तरह,
पर भीतर से मखमल सा प्यार छुपाते हैं बेटे।

  • राम पटेल सोनभद्र ✍️

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