प्रलय का साधक हूँ मैं, शांति से अब क्या नाता,
भीतर ज्वाला जलती ऐसी, खुद से भी डर जाता।
पालनहार भी मौन खड़े हैं, किससे अब फरियाद करूँ,
मंदिर, मस्जिद, श्मशान भटका, किसको अपना याद करूँ।
नेह नगर में भीख माँगी, प्रेम नहीं, अपमान मिला,
जिसे समझा था खुदा अपना, वही मुझे वीरान मिला।
मृगनयनी की आँखों में जो, स्वर्ग दिखा करता था,
वही नयन अब तीर बने हैं, हर सपना मरता था।
कोमल गाल हिरण से जिनके, छूते ही फूल खिलते थे,
आज वही चेहरे के काँटे, रूह तक को सिलते थे।
मोहपाश में बाँध के मुझको, हँसते-हँसते छोड़ गई,
मैं पागल सा डूबता रहा, वो दुनिया से जोड़ गई।
अब तो अंधेरे से यारी है, उजाले से बैर हुआ,
दिल था पहले प्रेम का सागर, अब बस ज़हर का ढेर हुआ।
काला जादू क्या सीखूँ मैं, खुद ही जादू बन बैठा,
जिसने दिल को तोड़ दिया था, अब वही दिल का कैदी ठहरा।
नर्क भी मुझसे दूर खड़ा है, स्वर्ग ने दरवाज़ा बंद किया,
मैंने खुद को खोकर देखा, तब जाकर खुद को पहचान लिया।
अब जो खूँखार बना हूँ मैं, वो मेरी पहचान नहीं,
ये तो दुनिया की देन है बस, मेरा असली अरमान नहीं।।
राम पटेल सोनभद्र ✍️