किसी के वादों पे हो निसार,
किसी का सच दबा दे बार-बार,
किसी के हिस्से में आए अंधियार,
राजनीति का नाम है…
झूठ की थैली लिए घूमते,
सच को सड़कों पे हम चूमते,
वोट के दिन सब हाथ जोड़ते,
फिर पाँच साल हमें भूलते,
किसी को हो न हो उन्हें सरकार,
राजनीति का नाम है…
कुर्सी की खातिर खेल हजार,
अपनों से भी करते वार,
जनता रोती, वो हँसते यार,
कैसा ये व्यापार है…
मिटे जो जनता, उनको क्या परवाह,
बस कुर्सी से ही उनका नाता,
किसी के आँसू बनें अख़बार,
राजनीति का नाम है…
नोटों की बरसात यहाँ,
सच की होती हार यहाँ,
भाषण में सपनों का संसार,
हकीकत में बेकार यहाँ,
किसी को रोटी, किसी को अधिकार,
बस वादों में मिलता प्यार,
किसी के वास्ते ना सच्चा विचार,
राजनीति का नाम है..
- राम पटेल, सोनभद्र