सपनों की नगरी अब श्मशान हो गई
इंसानियत की पहचान भी अनजान हो गयी
महँगाई के बोझ से कमर झुकी सबकी
गरीब की थाली अब लहूलुहान हो गई
कुर्सी पर बैठे हुक्मरानों, अब जवाब दीजिए
मेरी उजड़ी हुई बस्ती का ज़रा हिसाब दीजिए
डिग्री थामे हाथों को थोड़ा काम दीजिए
युवाओं की बेबसी को अब नया मुकाम दीजिए
अस्पतालों की चौखट पर ज़िंदगी हैरान हो गई
साँसों की भी अब तो बड़ी भारी लगान हो गई
महलों की चमक में झोपड़ियाँ ओझल हो गई
गाँव की खुशहाली अब शहरों में खोकर पागल हो गई
भ्रष्टाचार के अंधेरे में जो डूबकर आये
वो लुटेरे देश को लूटकर फिर लौटकर आये
वक्त की अदालत में इंसाफ़ का मंज़र आये
जनता के हक में भी अब कोई रहबर आये
राम पटेल सोनभद्र