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सियासत का हाल

सच की बात करे तो गुनहगार ठहरता है, झूठ यहाँ हर चेहरे का गहना-सा लगता…

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गन्दी राजनीति

किसी के वादों पे हो निसार, किसी का सच दबा दे बार-बार, किसी के हिस्से…

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आत्म-मंथन

राहों को पाषाण होने दो, वक्त को व्यवधान होने दो। भीतर की उस ज्वाला से…

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अधूरा अग्निपथ…

प्रलय का साधक हूँ मैं, शांति से अब क्या नाता, भीतर ज्वाला जलती ऐसी, खुद…

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फागुन | Fagun

बाबा रस्ता देख रहे हैं कब आयेंगे लाल हमारे, बिन फागुन के बीत गए हैं…

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बेटे (Bete)

कहाँ कह पाते हैं वो अपनी तकलीफ़ें, हँसकर घर का हर बोझ उठा लेते हैं…

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