देश के दुर्दशा का हिसाब
सपनों की नगरी अब श्मशान हो गई इंसानियत की पहचान भी अनजान हो गयी महँगाई…
सपनों की नगरी अब श्मशान हो गई इंसानियत की पहचान भी अनजान हो गयी महँगाई…
केवल दो गीत लिखे मैंने इक गीत तुम्हारे मिलने का इक गीत तुम्हारे खोने का।…
सच की बात करे तो गुनहगार ठहरता है, झूठ यहाँ हर चेहरे का गहना-सा लगता…
किसी के वादों पे हो निसार, किसी का सच दबा दे बार-बार, किसी के हिस्से…
भूख से तड़पते बचपन पर, कैसा यह उपकार है? पत्थर की उन मूर्तों पर, क्यूँ…
प्रलय का साधक हूँ मैं, शांति से अब क्या नाता, भीतर ज्वाला जलती ऐसी, खुद…
बाबा रस्ता देख रहे हैं कब आयेंगे लाल हमारे, बिन फागुन के बीत गए हैं…
उत्तर प्रदेश का मस्तक, ‘सोनभद्र (Sonbhadra)’ जिसका नाम, कैमूर की पर्वत मालाएँ और ऋषियों का…
कहाँ कह पाते हैं वो अपनी तकलीफ़ें, हँसकर घर का हर बोझ उठा लेते हैं…