राहों को पाषाण होने दो,
वक्त को व्यवधान होने दो।
भीतर की उस ज्वाला से अब,
नया एक निर्माण होने दो।।
छल की चौसर बिछी हुई है,
शकुनि हर कोने में बैठा।
धर्म युद्ध है स्वयं स्वयं से,
अर्जुन सा संधान होने दो।
कायरता की बेड़ियाँ टूटे,
पौरुष का जयगान होने दो।
राहों को पाषाण होने दो,
नया एक निर्माण होने दो।।
मौन रहा जो अब तक भीतर,
शंखनाद उसे बन जाने दो।
गीली मिट्टी सा मन मेरा,
पावक में तप तन जाने दो।
काली रातों की छाती पर,
उजला हिंदुस्तान होने दो।
राहों को पाषाण होने दो,
नया एक निर्माण होने दो।।
अश्रु नहीं अब अंगारे हों,
पीड़ा ही हथियार बनेगी।
खंडहर होते विश्वासों पर,
फिर से एक दीवार बनेगी।
मिट्टी के इस तन को अब तुम,
चेतना का आसमान होने दो।
राहों को पाषाण होने दो,
नया एक निर्माण होने दो।।
रचना – राम पटेल, सोनभद्र
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