देश के दुर्दशा का हिसाब

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​सपनों की नगरी अब श्मशान हो गई
इंसानियत की पहचान भी अनजान हो गयी

​महँगाई के बोझ से कमर झुकी सबकी
गरीब की थाली अब लहूलुहान हो गई

​कुर्सी पर बैठे हुक्मरानों, अब जवाब दीजिए
मेरी उजड़ी हुई बस्ती का ज़रा हिसाब दीजिए

​डिग्री थामे हाथों को थोड़ा काम दीजिए
युवाओं की बेबसी को अब नया मुकाम दीजिए

​अस्पतालों की चौखट पर ज़िंदगी हैरान हो गई
साँसों की भी अब तो बड़ी भारी लगान हो गई

​महलों की चमक में झोपड़ियाँ ओझल हो गई
गाँव की खुशहाली अब शहरों में खोकर पागल हो गई

​भ्रष्टाचार के अंधेरे में जो डूबकर आये
वो लुटेरे देश को लूटकर फिर लौटकर आये

​वक्त की अदालत में इंसाफ़ का मंज़र आये
जनता के हक में भी अब कोई रहबर आये

राम पटेल सोनभद्र ✍️

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