भूख से तड़पते बचपन पर, कैसा यह उपकार है?
पत्थर की उन मूर्तों पर, क्यूँ इतना सत्कार है?
जिस देश की गलियों में सोता, आम आदमी नंगे पाँव,
वहाँ महलों की बातों का, आखिर क्या आधार है?
हवाओं में ज़हर घुला है, साँसें मांगती दान,
सड़कों पर सो रहे हैं देखो, अपने ही इंसान।
जब बुनियादी ज़रूरतें ही, अब तक हैं अधूरी,
तब विकास के नारों का, कैसा यह गुमान?
वो कहते हैं हम बढ़ रहे हैं, दुनिया में आगे,
पर हकीकत की डोर से, रिश्ते क्यूँ भागे?
शिक्षा और स्वास्थ्य की, हालत है बेहाल,
फिर भव्यता के नाम पर, क्यूँ बिछाए हैं जाल?
चीन, कोरिया, स्विट्जरलैंड, उनकी अपनी कहानी,
पर हमारे यहाँ क्यूँ प्यासी, है आज भी जवानी?
असली विकास तो वो है, जहाँ पेट भरा हो सबका,
सिर्फ ईंटों की चमक से, नहीं बदलती ज़िंदगानी।
उठाओ आवाज़ कि अब, हिसाब चाहिए,
खोखले वादों का नहीं, जवाब चाहिए।
विकसित भारत वही, जहाँ इंसानियत मुस्कुराए,
हर हाथ को काम और, हर सर को छत मिल जाए।
रचना: राम पटेल सोनभद्र ✍️