अब वफ़ाओं की कसमें

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क्या कहेगी कभी मिलने भी अगर आएगी वो
अब वफ़ादारी की क़स्में तो नहीं खाएगी वो

हम समझते थे कि हम उस को भुला सकते हैं
वो समझती थी हमें भूल नहीं पाएगी वो

कितना सोचा था पर इतना तो नहीं सोचा था
याद बन जाएगी वो ख़्वाब नज़र आएगी वो

सब के होते हुए इक रोज़ वो तन्हा होगी
फिर वो ढूँढेगी हमें और नहीं पाएगी वो

इत्तिफ़ाक़न जो कभी सामने आई थी
अब वो तन्हा तो न होगी जो ठहर जाएगी वो।

रचना: राम पटेल सोनभद्र 

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